2018 में अपने पहले ट्वीट से ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को सीधा और सख्त संदेश दिया और निशाना भी सही मौके पर सही जगह लगा. आतंकवाद पर पाकिस्तान की दोहरी नीति नई बात नहीं. इसने हर वह काम किया, जिससे दुनिया को तकलीफ हुई. वाशिंगटन भी लंबे समय से इसकी आलोचना करता रहा है कि वह उन हक्कानी नेटवर्क और अफगान तालिबान जैसे आतंकी समूहों की मदद करता है, जिनकी करतूतें किसी से छिपी नहीं हैं. ये अफगानिस्तान में अमेरिकी और गठबंधन सेनाओं पर हमले कर पाकिस्तान में शरण लेते रहे.

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन आरोपों को भले नकारे, लेकिन हमेशा इनका मददगार रहा. बराक ओबामा भी पाकिस्तान से इसी तरह परेशान थे. अगस्त 2016 में उन्होंने भी पाकिस्तान को मिलने वाली 300 करोड़ डॉलर की सहायता इसीलिए रोकी थी. ट्रंप प्रशासन ने तो पिछली गरमियों में ही सहायता रोककर इस्लामाबाद को रुख का संकेत दे दिया था.

दरअसल इस मुद्दे पर ओबामा जितना सही थे, ट्रंप भी उतने ही सही हैं, लेकिन पाकिस्तान को रास्ते पर लाने के लिए शायद इतना ही काफी न हो. निश्चित तौर पर अतीत में तो इतना भी नहीं हुआ. इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है कि आप आतंकवाद विरोध के नाम पर सैकड़ों-लाखों मिलियन डॉलर की सहायता एक ऐसे देश को देते रहें, जो आतंकवादी संगठनों को पनाह देता हो. आतंकवाद की अपने तरीके, अपनी सुविधा से व्याख्या करता हो. जबकि सच यही है कि आतंकवाद किसी भी रूप में हो, खतरनाक ही होता है. अच्छा या बुरा आतंकवाद जैसा कुछ नहीं होता, लेकिन पाकिस्तान अपनी सुविधा से इसी नीति पर चलता है. उसे समझना होगा कि ‘युद्ध और गलबहियां’ एकसाथ संभव नहीं हैं.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD10
 
सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 महीना)
USD2
 
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...