भारतीय रिजर्व बैंक की इजाजत और उस के कंट्रोल में चलने वाले एक और बैंक ने दरवाजे बंद कर दिए हैं. आईएल एंड एफएस, महाराष्ट्र कोऔपरेटिव बैंक, डीएचएफएल, यैस बैंक के बाद यह लक्ष्मी विलास बैंक एक बड़ा बैंक है जिस का दीवाला पिट गया. चेन्नई के इस बैंक की 563 ब्रांचें हैं और आम लोगों के 20,000 करोड़ रुपए जमा हैं. अब लोग केवल एक बार 25,000 रुपए अपने खातों या डिपौजिट से निकाल सकते हैं.

बैंक कई सालों से नुकसान में चल रहा था क्योंकि बैंक ऐसे कर्ज दे रहा था जिसे लेने वाले चुका नहीं रहे थे. बैंक खातों में तो ऐसे दिए कर्ज के पैसे को अपनी मिलकीयत समझता था और उन पर ब्याज को आमदनी मानता था पर असल में सब जीरो था.

बैंकों का फेल हो जाना कोई नई बात नहीं है और दुनियाभर में ऐसा होता है पर आम आदमी जिस ने इन बैंकों में पैसा जमा कर रखा होता है बुरी तरह मार खाता है. पहले तो उसे लगता है कि उस का पैसा इन बैंकों में सेफ है और इसीलिए कम ब्याज में भी जमा करा देता है.

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जहां ये सरकारी लगने वाले बैंक सिर्फ 7-8 फीसदी से ज्यादा ब्याज नहीं देते थे, निजी साहूकार कर्ज लेने जाओ  तो 30-40 फीसदी तक का ब्याज झटक लेते थे. सारे देश में चिटफंड कंपनियों का जालजंजाल इसीलिए फैला कि लोगों को भरोसा हो गया था कि सरकारी लगने वाले लक्ष्मी विलास बैंक जैसे बैंक लूटते हैं. चिटफंड कंपनियां 20 से  30 फीसदी तक के मुनाफे का वादा करती थीं और शुरू के 1,000-2,000 हजार जमाकर्ताओं को इतना पैसा मिल भी जाता था.

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