सरस सलिल विशेष

स्वर्णिमा खिड़की के पास खड़ी हो बाहर लौन में काम करते माली को देखने लगी. उस का छोटा सा खूबसूरत लौन माली की बेइंतहा मेहनत, देखभाल व ईमानदारी की कहानी कह रहा था. वह कहीं भी अपने काम में कोताही नहीं बरतता है…बड़े प्यार, बड़ी कोशिश, कड़ी मेहनत से एकएक पौधे को सहेजता है, खादपानी डालता है, देखभाल करता है.

गमलों में उगे पौधे जब बड़े हो कर अपनी सीमाओं से बाहर जाने के लिए अपनी टहनियां फैलाने लगते हैं, तो उन की काटछांट कर उन्हें फिर गमले की सीमाओं में रहने के लिए मजबूर कर देता है. उस ने ध्यान से उस पौधे को देखा जो आकारप्रकार का बड़ा होने के बावजूद छोटे गमले में लगा था. छोटे गमले में पूरी देखभाल व साजसंभाल के बाद भी कभीकभी वह मुरझाने लग जाता था.

माली उस की विशेष देखभाल करता है. थोड़ा और ज्यादा काटछांट करता है, अधिक खादपानी डालता है और वह फिर हराभरा हो जाता है. कुछ समय बाद वह फिर मुरझाने लगता. माली फिर उस की विशेष देखभाल करने में जुट जाता. पर उस को पूरा विकसित कर देने के बारे में माली नहीं सोचता. नहीं सोच पाता वह यह कि यदि उसे उस पौधे को गमले की सीमाओं में बांध कर ही रखना है तो बड़े गमले में लगा दे या फिर जमीन पर लगा कर पूरा पेड़ बनने का मौका दे. यदि उस पौधे को उस की विस्तृत सीमाएं मिल जाएं तो वह अपनी टहनियां चारों तरफ फैला कर हराभरा व पुष्पपल्लवित हो जाएगा.

लेकिन शायद माली नहीं चाहता कि उस का लगाया पौधा आकारप्रकार में इतना बड़ा हो जाए कि उस पर सब की नजर पडे़ और उसे उस की छाया में बैठना पड़े. एक लंबी सांस खींच कर स्वर्णिमा खिड़की से हट कर वापस अपनी जगह पर बैठ गई और उस लिफाफे को देखने लगी जो कुछ दिनों पहले डाक से आया था.

वह कविता लिखती थी स्कूलकालेज के जमाने से, अपने मनोभावों को जाहिर करने का यह माध्यम था उस के पास, अपनी कविताओं के शब्दों में खोती तो उसे किसी बात का ध्यान न रहता. उस की कविताएं राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छपती थीं और कुछ कविताएं उस की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में भी छप चुकी थीं. साहित्यिक पत्रिकाओं में छपी उस की कविताएं साहित्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठा पा चुके लोगों की नजरों में भी आ जाती थीं.

उस का कवि हृदय, कोमल भावनाएं और हर बात का मासूम पक्ष देखने की कला अकसर उस के पति वीरेन के विपरीत स्वभाव से टकरा कर चूरचूर हो जाते. वीरेन को कविता लिखना खाली दिमाग की उपज लगती. किताबों का संगसाथ उसे नहीं सुहाता था. शहर में हो रहे कवि सम्मेलनों में वह जाना चाहती तो वीरेन यह कह कर ना कर देता, ‘क्या करोगी वहां जा कर, बहुत देर हो जाती है ऐसे आयोजनों में…ये फालतू लोगों के काम हैं…तुम्हें कविता लिखने का इतना ही शौक है तो घर में बैठ कर लिखो.’

उस के लिए ये सब खाली दिमाग व फालतू लोगों की बातें थीं. जब कभी बाहर के लोग स्वर्णिमा की तारीफ करते तो वीरेन को कोई फर्क नहीं पड़ता. उस के लिए तो घर की मुरगी दाल बराबर थी. कहने को सबकुछ था उस के पास. बेटी इसी साल मैडिकल के इम्तिहान में पास हो कर कानपुर मैडिकल कालेज में पढ़ाई करने चली गई थी. वीरेन की अच्छी नौकरी थी. एक पति के रूप में उस ने कभी उस के लिए कोई कमी नहीं की. पर पता नहीं उस के हृदय की छटपटाहट खत्म क्यों नहीं होती थी, क्या कुछ था जिसे पाना अभी बाकी था. कौन सा फलक था जहां उसे पहुंचना था.

उसे हमेशा लगता कि वीरेन ने भी एक कुशल माली की तरह उसे अपनी बनाई सीमाओं में कैद किया हुआ है. उस से आगे उस के लिए कोई दुनिया नहीं है. उस से आगे वह अपनी सोच का दायरा नहीं बढ़ा सकती. जबजब वह अपनी टहनियों को फैलाने की कोशिश करती, वीरेन एक कुशल माली की तरह काटछांट कर उसे उस की सीमा में रहने के लिए बाध्य कर देता.

उसे ताज्जुब होता कि बेटी की तरक्की व शिक्षा के लिए इतना खुला दिमाग रखने वाला वीरेन, पत्नी को ले कर एक रूढि़वादी पुरुष क्यों बन जाता है. वह लिफाफा खोल कर पढ़ने लगी. देहरादून में एक कवि सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा था, जिस में कई जानेमाने कविकवयित्रियां शिरकत कर रहे थे और उसे भी उस आयोजन में शिरकत करने का मौका मिला था.

पर उसे मालूम था कि जो वीरेन उसे शहर में होने वाले आयोजनों में नहीं जाने देता, क्या वह उसे देहरादून जाने देगा. जबकि देहरादून चंडीगढ़ से कुछ ज्यादा दूर नहीं था. पर वह अकेली कभी गई ही नहीं, वीरेन ने कभी जाने ही नहीं दिया. वीरेन न आसानी से खुद कहीं जाता था न उसे जाने देता था.

वीरेन की तरफ से हमेशा न सुनने की आदी हो गई थी वह, इसलिए खुद ही सोच कर सबकुछ दरकिनार कर देती. वीरेन से ऐसी बात करने की कोशिश भी न करती. पर पता नहीं आज उस का मन इतना आंदोलित क्यों हो रहा था, क्यों हृदय तट?बंध तोड़ने को बेचैन सा हो रहा था.

हमेशा ही तो वीरेन की मानी है उस ने, हर कर्तव्य पूरे किए. कहीं पर भी कभी कमी नहीं आने दी. अपना शौक भी बचे हुए समय में पूरा किया. क्या ऐसा ही निकल जाएगा सारा जीवन. कभी अपने मन का नहीं कर पाएगी. और फिर ऐसा भी क्या कर लेगी, क्या कुछ गलत कर लेगी. इसी उधेड़बुन में वह बहुत देर तक बैठी रही.

कुछ दिनों से शहर में पुस्तक मेला लगा हुआ था. वह भी जाने की सोच रही थी. उस दिन वीरेन के औफिस जाने के बाद वह तैयार हो कर पुस्तक मेले में चली गई. किताबें देखना, किताबों से घिरे रहना उसे हमेशा सुकून देता था.

मेले में वह एक स्टौल से दूसरे स्टौल पर अपनी पसंद की कुछ किताबें ढूंढ़ रही थी. एक स्टौल पर प्रसिद्ध कवि व कवयित्रियों के कविता संकलन देख कर वह ठिठक कर किताबें पलटने लगी.

‘‘स्वर्णिमा,’’ एकाएक अपना नाम सुन कर उस ने सामने देखा तो कुछ खुशी, कुछ ताज्जुब से सामने खड़े राघव को देख कर चौंक गई.

सरस सलिल विशेष

‘‘राघव, तुम यहां? हां, लेकिन तुम यहां नहीं होंगे तो कौन होगा,’’ स्वर्णिमा हंस कर बोली, ‘‘अभी भी कागजकलमदवात का साथ नहीं छूटा, रोटीकपड़ामकान के चक्कर में…’’

‘‘क्यों, तुम्हारा छूट गया क्या,’’ राघव भी हंस पड़ा, ‘‘लगता तो नहीं वरना पुस्तक मेले में कविता संकलन के पृष्ठ पलटते न दिखती.’’

‘‘मैं तो चंडीगढ़ में ही रहती हूं, पर तुम दिल्ली से चंडीगढ़ में कैसे?’’

‘‘हां, बस औफिस के काम से आया था एक दिन के लिए. मेरी भी किताबें लगी हैं ‘किशोर पब्लिकेशन हाउस’ के स्टौल पर. फोन पर बताया था उन्होंने, इसलिए समय निकाल कर यहां आ गया.’’

‘‘किताबें?’’ स्वर्णिमा खुशी से बोली, ‘‘मुझे तो पता ही नहीं था कि तुम्हारे उपन्यास भी छप चुके हैं और वह भी इतने बडे़ पब्लिकेशन हाउस से. पर किस नाम से लिख रहे हो?’’

‘‘किस नाम से, क्या मतलब… विवेक दत्त के नाम से ही लिख रहा हूं.’’

‘‘ओह, मैं ने कभी ध्यान क्यों नहीं दिया. पता होता तो किताबें पढ़ती तुम्हारी.’’

‘‘तुम ने ध्यान ही कब दिया,’’ अपनी ही बोली गई बात को अपनी हंसी में छिपाता हुआ राघव बोला.

स्वर्णिमा ने राघव की बात को लगभग अनसुना सा कर दिया. ‘‘बहुत दिनों बाद मिले हैं. चलो, चल कर थोड़ी देर कहीं बैठते हैं,’’ स्वर्णिमा चलतेचलते बोली, ‘‘और किसकिस के संपर्क में हो कालेज के समय के दोस्तों में से?’’

‘‘बस, शुरू में तो संपर्क था कुछ दोस्तों से, समय के साथ सब खत्म हो गया.’’

‘‘और अपनी सुनाओ स्वर्णिमा. तुम तो कितनी अच्छी कविताएं लिखती थीं. कहां तक पहुंचा तुम्हारा लेखन, कितने संकलन छप चुके हैं?’’

‘‘एक भी नहीं, गृहस्थी के साथ यह सब कहां हो पाता है. बस, छिटपुट कविताएं यहांवहां पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में भी छपी हैं,’’ वह राघव से नजरें चुराती हुई  बोली.

‘‘जब मैं नौकरी के दौरान लिख सकता हूं तो तुम गृहस्थी के साथ क्यों नहीं?’’

‘‘बस, शायद यही फर्क है स्त्रीपुरुष का. स्त्री घर के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित कर देती है, जबकि पुरुष का समर्पण आंशिक रूप से ही रहता है.’’

‘‘यह तो तुम सरासर इलजाम लगा रही हो मुझ पर,’’ राघव हंसता हुआ बोला, ‘‘मैं भी गृहस्थी के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी करता हूं…’’

‘‘पर फिर भी पत्नी के लिए पति एक सीमारेखा तो खींच ही देता है. उस का शौक पति के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं होता. पौधे को अगर जड़ें फैलाने को ही न मिलें तो मजबूती कहां से आएगी राघव? पौधे को अगर गमले की सीमाओं में पनपने के लिए ही बाध्य किया जाए तो वह अपनी पूर्णता कैसे प्राप्त करेगा? परिंदे अगर पिंजरे के बाहर पंख न फैला पाएं तो फिर…’’

स्वर्णिमा ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी. राघव ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अच्छा छोड़ो इन बातों को, अपने परिवार के बारे में कुछ बताओ…’’ स्वर्णिमा बात टालने की गरज से बोली.

‘‘बैंक में जौब करता हूं. 2 छोटे बच्चे हैं, पत्नी है. और तुम्हारे बच्चे? ’’

‘‘मेरी बेटी ने इसी साल कानपुर मैडिकल कालेज में दाखिला लिया है.’’

‘‘इतनी बड़ी बेटी कब हो गई तुम्हारी?’’

‘‘तुम भूल रहे हो राघव कि मेरा विवाह, बीकौम फाइनल ईयर में ही हो गया था.’’

‘‘कैसे भूल सकता हूं वह सब,’’ राघव एक लंबी सांस खींच कर बोला, ‘‘अचानक गायब हो गई थी गु्रप से,’’ राघव का स्वर संजीदा हो गया, ‘‘पीछे मुड़ कर भी न देखा.’’

‘‘शादी के बाद ऐसा ही होता है, नई जिम्मेदारियां आ जाती हैं…’’

‘‘और नए अपने भी बन जाते हैं,’’ राघव लगभग व्यंग्य करता हुआ बोला.

‘‘बहुत बोलना सीख गए हो राघव…’’

‘‘हां, तब के कालेज में बीकौम कर रहे राघव और अब के राघव में बहुत फर्क भी तो है उम्र का.’’

‘‘और रुतबे का भी,’’ स्वर्णिमा बात पूरी करती हुई बोली, ‘‘अब तो साहित्यकार भी हो, सफल इंसान भी हो जिंदगी में हर तरह से.’’

‘‘क्यों, ईर्ष्या हो रही है क्या?’’

‘‘हां, हो तो रही है थोड़ीथोड़ी,’’ दोनों हंस पड़े.

‘‘नहीं स्वर्ण, सौरी स्वर्णिमा, मैं तो वैसा ही हूं अभी भी.’’

‘‘स्वर्ण ही बोलो न राघव. कालेज में तो मुझे सभी इसी नाम से बुलाते थे. ऐसा लगता है, वापस कालेज के प्रांगण में पहुंच गई हूं मैं. थोड़े समय तुम्हारे साथ उन बीती यादों को जी लूं. जब दिल में सिर्फ भविष्य की मनभावन कल्पनाएं थीं, न कि अतीत की अच्छीबुरी यादों की सलीब.’’

‘‘कवयित्री हो, उसी भाषा में अपनी बात कहना जानती हो. मैं कहता था न तुम्हें हमेशा कि कविता में दिल की भावनाओं को जाहिर करना ज्यादा आसान होता है, बजाय कहानी के.’’

‘‘लेकिन मुझे तो हमेशा लगता है कि गद्य, पद्य से अधिक सरल होता है और पढ़ने वाले को कहने वाले की बात सीधे समझ में आ जाती है,’’ स्वर्णिमा अपनी बात पर जोर डाल कर बोली.

‘‘नहीं स्वर्ण, कविता पढ़ने वाला जब कविता पढ़ता है, तो बोली हुई बात उसे सीधे खुद के लिए बोली जैसी लगती है. और कविता का भाव सीधे उस के दिल में उतर जाता है. फिर कविता में तुम कम शब्दों में बिना किसी लागलपेट के अपनी बात जाहिर कर सकती हो, लेकिन कहानी के पात्र जो कुछ बोलते हैं, एकदूसरे के लिए बोलते हैं और बात पात्रों में उलझ कर रह जाती है. कभीकभी तो पूरी कहानी लिख कर लगता है कि जो कहना चाहते थे, ठीक से कह ही नहीं पाए.’’

‘‘चलो, यही सही. बहुत समय बाद कोई मिला राघव, जिस से इस विषय पर ऐसी बात कर पा रही हूं,’’ स्वर्णिमा मुसकराती हुई बोली, ‘‘ऐसा लगता था जैसे मैं अपनी तर्कशक्ति ही खो चुकी हूं, हर बात मान लेने की आदत सी पड़ गई है.’’

‘‘तर्कशक्ति तो तुम सचमुच खो चुकी हो स्वर्ण,’’ राघव हंसता हुआ बोला, ‘‘कालेज के जमाने में तो तर्क में तुम से जीतना मुश्किल होता था और आज तुम ने सरलता से हार मान ली.’’

‘‘अब हार मानना सीख गई हूं. तुम ने जो जीतना शुरू कर दिया है,’’ स्वर्णिमा हंस कर बात को हवा में उड़ाते हुए बोली.

‘‘जब से जिंदगी में बड़ी हार से सामना हुआ, तब से जीतने की आदत डाल ली.’’

स्वर्णिमा को लगा, बहुत बड़ा मतलब है राघव के इस वाक्य का. बात को अनसुनी सी करती हुई बोली, ‘‘कब तक हो चंडीगढ़ में, वापसी कब की है?’’

‘‘बस, कल जा रहा हूं,’’ वह उठता हुआ बोला, ‘‘तुम 5 मिनट बैठो, मैं अभी आया,’’  कह कर राघव चला गया.

स्वर्णिमा उसे जाते हुए देखती रही. सचमुच कालेज के जमाने के राघव और आज के राघव में जमीनआसमान का फर्क था. उस का निखरा व्यक्तित्व उस की सफलता की कहानी बिना कहे ही बयान कर रहा था. उस का हृदय कसक सा गया.

6 लड़केलड़कियों का गु्रप था उन का. कालेज में खूब मस्ती भी करते थे और खूब पढ़ते भी थे. राघव और वह दोनों ही पढ़नेलिखने के शौकीन थे. वह कविताएं लिखती थी और राघव कहानियां व लेख वगैरह लिखा करता था. राघव ने ही उसे उकसाया कि वह अपनी कविताएं पत्रिकाओं में भेजे और उसी की कोशिश से ही उस की कविताएं पत्रिकाओं में छपने लगी थीं. पढ़ने के लिए भी वे एकदूसरे को किताबें दिया करते थे. एकदूसरे को किताबें लेतेदेते, अपना लिखा पढ़तेपढ़ाते कब वे एकदूसरे करीब आ गए, उन्हें पता ही नहीं चला.

समान रुचियां उन्हें एकदूसरे के करीब तो ले आईं पर दोनों के दिलों में फूटी प्यार की कोंपलें अविकसित ही रह गईं. सबकुछ अव्यक्त ही रह गया. उन्हें मौका ही नहीं मिल पाया एकदूसरे की भावनाओं को ठीक से समझने का. वह राघव की आंखों में अपने लिए बहुतकुछ महसूस करती, पर कभी राघव ने कुछ कहा नहीं. वह भी जानती थी कि राघव अभी बीकौम ही कर रहा है, वह भी इतनी दूर तक उस का साथ नहीं दे पाएगी. उस के पिता उस के विवाह की पेशकश करने लगे थे. इसलिए उस ने भी उस की आंखों की भाषा पढ़ने की कोशिश नहीं की.

और फाइनल ईयर के इम्तिहान से पहले ही उस का विवाह तय हो गया. उस ने जब अपने विवाह का कार्ड अपने गु्रप को भेजा, तो सभी चहकने लगे, उसे छेड़ने लगे. लेकिन राघव हताश, खोयाखोया सा उसे देख रहा था जैसे उस के सामने उस का सारा संसार लुट गया हो और वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

इम्तिहान के बाद उस का विवाह हो गया और उन दोनों के दिलों में सबकुछ अव्यक्त, अनकहा ही रह गया. वीरेन से विवाह हुआ तो वीरेन एक अच्छे पिता थे, अच्छे पति थे, पर ठीक उस माली की तरह. वे उसे प्यार से सहेजते, देखभाल करते पर सीमाओं में बांधे रखते. पति से अलग जाने की, अलग सोचने की उस की क्षमता धीरेधीरे खत्म हो गई. उस का लेखन बस, थोड़ाबहुत इधरउधर पत्रिकाओं तक ही सीमित रह गया.

तभी किताबें हाथ में उठाए राघव सामने से आता दिखाई दिया.

‘‘ये सब क्या?’’

‘‘मेरी किताबें हैं और कुछ तुम्हारी पसंद के प्रसिद्ध कवि व कवयित्रियों के संकलन हैं. तुम्हारे लिए पैक करवा लाया हूं,’’ वह बैग उस की तरफ बढ़ाता हुआ बोला.

‘‘ओह, थैंक्स राघव,’’ वह राघव को देख रही थी. सोचने लगी, भूख क्या सिर्फ शरीर या पेट की होती है. मानसिक और दिमागी भूख भी तो एक भूख है, जिसे हर कोई शांत नहीं कर सकता. क्यों इतने बेमेल जोड़े बन जाते हैं. राघव और उस के बीच एक मजबूत दिमागी रिश्ता है, जो किताबों से होता हुआ एकदूसरे तक पहुंचता है.

‘‘क्या सोच रही हो,’’ राघव उस की आंखों के  आगे हथेली लहराता हुआ बोला.

‘‘कुछ नहीं,’’ वह संभल कर बैठती हुई बोली, ‘‘तुम्हारी पत्नी को तो बहुत गर्व होता होगा तुम पर. उसे भी पढ़नेलिखने का शौक है क्या?’’

‘‘उसे स्वेटर बुनने का बहुत शौक है,’’ राघव ठहाका मार कर हंसता हुआ बोला, ‘‘हम तीनों को उसी के बुने हुए स्वेटर पहनने पड़ते हैं.’’ यह सुन कर वह भी खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘स्वर्ण, कभी कालेज का समय याद नहीं करतीं तुम, कभी दोस्तों की याद नहीं आती?’’ राघव की आवाज एकाएक गंभीर हो गई थी.

स्वर्णिमा ने नजरें उठा कर राघव के चेहरे  पर टिका दीं. कितना कुछ था उन निगाहों में पढ़ने के लिए, कितने भाव उतर आए थे. पर उन भावों को तब न पढ़ा, अब तो वह पढ़ना भी नहीं चाहती थी.

‘‘आती है राघव, क्यों नहीं आएगी भला, दोस्तों की याद. यादें तो इंसान की सब से बड़ी धरोहर होती हैं,’’ कह कर स्वर्णिमा उठ खड़ी हुई, ‘‘चलती हूं राघव, समय ने चाहा तो इसी तरह किसी पुस्तक मेले में फिर मुलाकात हो जाएगी.’’

‘‘स्वर्ण,’’ राघव भी उठ खड़ा हुआ, ‘‘कुछ कहना चाहता हूं तुम से,’’ उस के चेहरे पर निगाहें टिकाता हुआ वह बोला, ‘‘दोबारा ऐसी स्वर्ण से नहीं मिलना चाहता हूं मैं. कहां खो गई वह स्वर्णिमा जिस के होंठों से ही नहीं, चेहरे और आंखों के हावभावों से भी कविता बोलती थी. स्वर्ण, अगर पौधा गमले की सीमाएं तोड़ कर जड़ें जमीन की तरफ फैलाने की कोशिश नहीं करेगा, तो माली पौधे की बेचैनी कैसे समझेगा. परिंदा उड़ने के लिए पंख फैलाने की कोशिश नहीं करेगा, पंख नहीं फड़फड़ाएगा तो दूसरे तक उस की फड़फड़ाहट पहुंचेगी कैसे. कोशिश तो खुद ही करनी पड़ती है.

‘‘स्वर्ण, परिस्थितियों से हार मत मानो,’’ वह क्षणभर रुक कर फिर बोला, ‘‘मैं यह नहीं कहता कि जिंदगी को उलटपलट कर रख दो, अपनी गृहस्थी को आग लगा दो या अपने वैवाहिक जीवन को बरबाद कर दो पर अपने पंखों को विस्तार देने की कोशिश तो करो. कितनी बार रोक सकेगा कोई तुम को. अपनी जड़ों को फैलाने की कोशिश तो करो. बढ़ने दो टहनियों को, कितनी बार काटेगा माली. थक जाएगा वह भी. कोई साथ नहीं देता तो अकेले चलो स्वर्ण. तुम्हें चलते देख, साथ चलने वाला, साथ चलने लगेगा.’’

स्वर्णिमा एकटक राघव का चेहरा देख रही थी.

‘‘स्वर्ण, कवि सम्मेलनों में शिरकत करो, बाहर निकलो, अपनी कविताओं का संकलन छपवाने की दिशा में प्रयास करो. कवि सम्मेलनों में दूसरे कविकवयित्रियों से मिलनेजुलने से तुम्हारे लेखन को विस्तार मिलेगा, नया आयाम मिलेगा, तुम्हारा लेखन बढ़ेगा, विचार बढ़ेंगे, प्रेरणा मिलेगी और जानकारियां बढ़ेंगी तुम्हारी.

‘‘और मुझ से कोई मदद चाहिए तो निसंकोच कह सकती हो. मुझे बहुत खुशी होगी. मेरी किताबों के पीछे मेरा फोन नंबर व पता लिखा है, जब चाहे संपर्क कर सकती हो. मेरी बात याद रखना स्वर्ण, तुम्हारा शौक व जनून तुम्हें खुश व जिंदा रखता है, स्वस्थ रखता है…अभिनय, नृत्य, संगीत, गाना, लेखन ये सब विधाएं कला हैं, हुनर हैं, जो प्रकृतिदत्त हैं. ये हर किसी को नहीं मिलतीं. ये सब कलाएं नियमित अभ्यास से ही फलतीफूलती व निखरती हैं. यह नहीं कि जब कभी पात्र भर जाए, मन आंदोलित हो जाए तो थोड़ा सा छलक जाए. बस, उस के बाद चुप बैठ जाओ. किसी भी कला से लगातार जुड़े रहने से कला को विस्तार मिलता है, लिखते रहने से नए विचार मिलते हैं.

‘‘अपने शौक को मारना, मरने जैसा है. खुद को मत मारो स्वर्ण.’’

‘‘मैं तुम्हारी बात का ध्यान रखूंगी राघव,’’ स्वर्णिमा किसी तरह बोली. उस का कंठ अवरुद्ध हो गया था. उस ने किताबों का बैग उठाया और जाने के लिए पलट गई. थोड़ी दूर गई. राघव उसे जाते हुए देख रहा था. एकाएक कुछ सोच कर स्वर्णिमा पलट कर वापस राघव के पास आ गई.

‘‘मुझे माफ कर देना राघव. दरअसल, उम्र का वह वक्त ही ऐसा होता है जब हम अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं होते.’’

आंसू छलक आए राघव की आंखों में. स्वर्णिमा की हथेली अपने हाथों में ले कर थपक दी उस ने. ‘‘नहीं स्वर्ण, तुम माफी क्यों मांग रही हो. मैं भी तो कुछ नहीं बोल पाया था तब. बहुतों के साथ ऐसा हो जाता होगा जिन के दिल का एक कोना अनकहा, अव्यक्त और कुंआरा ही रह जाता है, सबकुछ बेमेल और गड्डमड्ड सा हो जाता है जीवन में.’’

दोनों ने एकदूसरे को एक बार भरीआंखों से निहारा. स्वर्णिमा पलटी और चली गई. राघव सजल, धुंधलाती निगाहों से उसे जाते देखता रहा. पता नहीं कहां किस मोड़ पर जिंदगी अनचाहा मोड़ ले लेती है. इंसान समझ नहीं पाता और पूरी जिंदगी उसी मोड़ पर चलते रहना पड़ता है. समान रुचि वाले 2 इंसान हमसफर क्यों नहीं बन पाते. उस ने लंबी सांस खींच कर अपनी उंगलियों से अपनी आंखों को जोर से दबा कर आंसू पोंछ डाले.

स्वर्णिमा घर पहुंची तो वीरेन औफिस से आ चुका था, ‘‘बहुत देर कर दी तुम ने, मैं ने फोन भी मिलाया था. पर तुम मोबाइल घर पर ही छोड़ गई थीं.’’

‘‘हां, भूल गई थी,’’ स्वर्णिमा व्यस्तभाव से बोली.

‘‘यह क्या उठा लाई हो?’’ उस के हाथों में बैग देख कर वीरेन बोले.

‘‘किताबें हैं, पुस्तक मेले से खरीदी हैं,’’ वह किताबें बाहर निकाल कर मेज पर रखती हुई बोली.

वीरेन ने एक उड़ती हुई नजर किताबों पर डाली. स्वर्णिमा जानती थी कि वीरेन की किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसलिए उस की बेरुखी पर उसे कोई ताज्जुब नहीं हुआ. वह किचन में गई, 2 कप चाय बना कर ले आई और वीरेन के सामने बैठ गई.

‘‘वीरेन, मैं कल देहरादून जा रही हूं 2 दिनों के लिए.’’

‘‘देहरादून? क्या, क्यों, किसलिए, क्या मतलब, किस के साथ,’’ वीरेन उसे घूरने लगा.

‘‘इतने सारे क्या, क्यों किसलिए वीरेन,’’ वह मुसकराई, ठंडे स्वर में बोली, ‘‘वहां एक कवि सम्मेलन है, मुझे भी निमंत्रण आया है,’’ वह निमंत्रणपत्र उस के हाथ में पकड़ाते हुए बोली.

‘‘क्या जरूरत है वहां जाने की. कवि सम्मेलनों में ऐसा क्या हो जाता है?’’ वह तल्ख स्वर में बोला, ‘‘यहां भी कवि सम्मेलन होते रहते हैं, तब तो तुम नहीं गईं.’’

सरस सलिल विशेष

‘‘वही गलती हो गई वीरेन. पर कल मैं जा रही हूं. जहां तक साथ की जरूरत है, तो हमारी कुंआरी खूबसूरत जवान बेटी कानपुर से चंड़ीगढ़ अकेली आतीजाती है, तब तुम नहीं डरते. मेरे लिए इतना डरने की क्या जरूरत है. किसी एक दिन तो कोई काम पहली बार होता ही है, फिर आदत पड़ जाती है.’’

यह कह कर स्वर्णिमा उठ खड़ी हुई और कमरे में जा कर अपना बैग तैयार करने लगी. वीरेन चुप खड़ा स्वर्णिमा की कही बात को सोचता रह गया. इतनी मजबूती से स्वर्णिमा ने अपनी बात पहले कभी नहीं कही थी.

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठ कर वीरेन के लिए सभी तैयारियां कर खुद भी तैयार हुई. अपना बैग ले कर बाहर आई तो लौबी में वीरेन खड़ा था.

‘‘तुम कहां जा रहे हो?’’ वह आश्चर्य से बोली.

‘‘तुम्हें बसस्टौप तक छोड़ देता हूं. कैसे जाओगी, पहले बताती तो मैं भी देहरादून चलता तुम्हारे साथ,’’ वीरेने की आवाज धीमी व पछतावे से भीगी हुई थी.

वीरेन की भीगी आवाज से उस का दिल भर आया. उस का हाथ सहलाते हुए बोली, ‘‘नहीं वीरेन, इस बार तो मैं अकेले ही जाऊंगी. अब तो इधरउधर आतीजाती रहूंगी. कितनी बार जाओगे तुम मेरे साथ. मैं ने आटो वाले को फोन कर दिया था, वह बाहर आ गया होगा गेट पर. मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी. मोबाइल पर बात करते रहेंगे.’’

और स्वर्णिमा निकल गई. बाहर लौन में देखा तो माली काम कर रहा था, ‘‘आज बहुत जल्दी आ गए माली, क्या कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं मेमसाहब, इस पौधे की जड़ों ने गमला तोड़ दिया है नीचे से. और जड़ें बाहर फैलने लगी हैं. अभी तक यह पौधा 4 गमले तोड़ चुका है, इसलिए मैं ने थकहार कर इसे जमीन पर लगा दिया है. लगता है, अब यह गमले में नहीं रुकेगा.’’

माली बड़बड़ा रहा था और वह खुशी से उस पौधे को देख रही थी जो जमीन पर लग कर लहरा व इठला रहा था. वह भी अपने अंदर एक नई स्वर्णिमा को जन्म लेते महसूस कर रही थी, जो अपनी जड़ों को मजबूती देगी और टहनियों को विस्तार देगी. यह सोच कर उस ने गेट खोला और एक नई उमंग व स्फूर्ति के साथ बाहर निकल गई.

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